यूक्रेन युद्ध : निक्सन की ऐतिहासिक भूल, लाचार अमेरिका और कमीशन एजेंट पाकिस्तान

 

Russia Ukraine War : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन की राजधानी कीव को कुचलने के मूड में हैं। सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक 40 मील लंबा सैन्य काफिला कीव की तरफ कूच कर गया है। अगर बेलारूस में बात नहीं बनी तो कीव में भारी तबाही मच सकती है। बड़ा सवाल ये भी है क्या अमेरिका इस भीषण अटैक को रोकने के लिए पोलैंड, जर्मनी में तैनात जंगी विमानों को जेलेंस्की की मदद के लिए भेजेगा? क्योंकि इस संकट के जड़ में भी वही है।

नई दिल्ली : 21वीं सदी में जिस युद्ध को अकल्पनीय माना जा रहा था उसे शुरू हुए पांच दिन बीत चुके हैं (Russia Ukraine War)। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) ने परमाणु हथियारों को सुपर अलर्ट मोड पर रख दिया है। यूक्रेन की राजधानी कीव (Kyiv War) की ओर 25 किलोमीटर लंबा आर्मी कॉनवॉय कूच कर चुका है जिसमें टैंक, मिसाइल सबकुछ है। लंबे खिंच रहे जंग को जल्दी निपटाने की कोशिश में न जाने की कितनी लाशें बिछेंगी, कहना मुश्किल है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (US President Joe Biden) निशाने पर हैं। पूरी दुनिया में थू-थू हो रही है। जंग की सटीक जानकारी देने के बावजूद अमेरिका इसे रोकने में नाकाम रहा। बाइडेन और नाटो की धमकियां गीदड़भभकी साबित हुई। जब ऐलान-ए-जंग के बाद जंग-ए-मैदान में उतरना ही नहीं था तो बेचारे यूक्रेन को उकसाने की क्या जरूरत थी? अमेरिका की लाचारी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी सामने आ गई। रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव तक पारित नहीं हो सका। बाइडेन ने आर्थिक प्रतिबंध जरूर लगाए लेकिन अमेरिका तो खुद चीन का कर्जदार है। और चीन आज किसके साथ खड़ा है दुनिया को मालूम है। भारत ने भी अब तक दो मौकों पर रूस के खिलाफ वोट करने से इनकार कर दिया। इसके भी ऐताहिसक कारण हैं। जिस सोवियत संघ को चेकमेट करने के लिए अमेरिका ने चीन साथ पींगे बढ़ाई वही आज उसके लिए काल बन गया है। हम आपको सहस्राब्दि की सबसे बड़ी भूल की तरफ लिए चलते हैं जो 98 साल के हेनरी किसिंजर को कचोट रहा होगा। वो तब अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे और उनके आका यानी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक गेम खेल था जिसमें पिसा भारत भी था।

पाकिस्तान में तख्तापलट कर मार्शल लॉ लगाने वाले याह्या खान 20 अक्टूबर, 1970 को वाइट हाउस पहुंचे। रिचर्ड निक्सन ने याह्या खान से कहा कि वो चीन को संदेश पहुंचाएं कि अमेरिका उससे बात करना चाहता है। इसके लिए जरूरत पड़ी तो गुपचुप तरीके से अमेरिकी डिप्लेमैट्स बीजिंग पहुंच जाएंगे। पाकिस्तानी तानाशाह ने ये खबर माओ त्सेतुंग तक पहुंचा दी। बदले में पाकिस्तान को 10 करोड़ डॉलर मिले। पाकिस्तान कमीशन एजेंट की तरह काम कर रहा था। निक्सन ने पाकिस्तान को हथियार भी दिलाए। यही नहीं जब 1971 में पाकिस्तान के साथ भारत जंग लड़ रहा था तब निक्सन ने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में घुसाने की धमकी दी। भारत वो दिन कैसे भूल सकता है। तब रूस ने ही अमेरिका को खबरदार किया था। खैर, 1971 में ही हेनरी किसिंजर बीजिंग जाकर निक्सन के दौरे की बनियाद रख दी।

1972 में रिचर्ड निक्सन का ऐतिहासिक दौरा हुआ। चीनी पीएम झाउ एन लाई और माओ से मुलाकात के बाद सहमति पत्र तैयार हुआ। अमेरिका ने ताइवान में मौजूद अपनी सेना हटाने पर सहमति दे दी। सोवियत संघ और चीन के बीच दरार पैदा करने के लिए अमेरिका ने ऐसा जुआ खेला जिसमें उसकी हार आज यूक्रेन में दिखाई दे रही है। फिर देंग शियाओ पिंग ने 1977 में आर्थिक सुधारों का ऐलान किया तो अमेरिका गदगद हो गया। दो साल बाद ही अमेरिका ने चीन के साथ कूटनीतिक रिश्ते पूरी तरह बहाल कर दिए। उसका भ्रम दस साल बाद ही थ्यानमेन चौक पर टूट गया जब चीनी सेना ने लोकतंत्र के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने ही लोगों पर टैंक चढ़ा दी। उधर चीन टस से मस नहीं हुआ। अमेरिकी कंपनियों को चीन में घुसने की पहली शर्त ही यही थी और अभी भी है कि ताइवान से कोई ताल्लुक न हो। आज भी चीन से कारोबार करने वाली अमेरिकी कंपनियां या एयरलाइन अपने ब्रोशर तक में ताइवान का जिक्र नहीं करती।

कमीशन एजेंट पाकिस्तान
दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की चौहद्दी में अमेरिकी कूटनीति के कारण परमाणु हथियार बनने लगे। अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान को मोहरा बनाया। उधर कमीशन एजेंट पाकिस्तान चीन की मदद से परमाणु बम बनाने लगा। लिहाजा भारत को इन हर हालात में रूस ने मदद पहुंचाई। सोवियत संघ के विघटन ने अमेरिका भले ही खुश हुआ लेकिन चीन उसकी कमजोर नस दबाता रहा। चीन ने सोवियत संघ को तोड़ने के लिए अमेरिका का इस्तेमाल किया। फिर रूस के खिलाफ अमेरिका का इस्तेमाल किया। इसी के बूते 2000 में अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में भी चीन की एंट्री करा दी। और आज अमेरिका में घुसकर उसी के खिलाफ अपनी ताकत का एहसास करा रहा है चीन। डोनाल्ड ट्रंप कुछ करते तब तक अमेरिका 29 खरब डॉलर का कर्जदार बन चुका था। ये आंकड़े पिछले साल के हैं। 1972 की उस गलती का परिणाम है कि ग्लोबल मैनुफैक्चरिंग और सप्लाई चेन अमेरिका नहीं चीन कंट्रोल करता है।

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रिचर्ड निक्सन चीन के पीएम झाउ एन लाई के साथ जिमनास्टिक का मजा लेते हए

चीन नई सदी में अमेरिका का इस्तेमाल कर उसे ही पीछे छोड़ने की नीति पर बदस्तूर आगे बढ़ता रहा। सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं बल्कि सैन्य ताकत के बूते भी। दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में ताकत बढ़ाकर उसने यूरोप और अमेरिका के बीच भी दरार पैदा कर दी। ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ पनडुब्बी समझौता रद्द कर दिया। अब ये ठेका अमेरिका को मिल गया है। चीन के खिलाफ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के गुटबंदी यानी AUKUS ने अमेरिका-फ्रांस के बीच रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर दी है। चीन के पैंतरेबाजी किस तरह काम कर रही है, इसे समझना मुश्किल नहीं है। इन सबके बीच वो ताइवान पर 1972 में खींची लकीर पर कायम है। बीच-बीच में उसके लड़ाकू जेट ताइवान एयरस्पेस में घुसते रहते हैं। हैरानी इस बात में है कि पिछले 30 वर्षों में अमेरिका ये क्यों नहीं समझ पाया कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी सोच वाले दोनों देश कभी इतने करीब भी आ सकते हैं।

चार फरवरी को यही हो गया। अमेरिका के खिलाफ रूस और चीन ने ऐसा समझौता किया है मानो कसम खा ली हो। रूस ने वन चाइना पॉलिसी को पूरी तरह मान लिया है। मतलब रूस अब मानता है कि ताइवान मेनलैंड चाइना का हिस्सा है। चीन चाहे तो हमला कर उसे मिला सकता है। दोनों देशों ने राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता पर किसी भी बाहरी देश के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करने का संकल्प लिया है। इसी समझौते के 23 दिनों बाद पुतिन ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। तो दोस्ती निभाने की बारी चीन की थी। उसने रूस के खिलाफ वोट करने से इनकार कर दिया। भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने भी ऐसा ही किया है। हमारे लिए रूस के साथ द्विपक्षीय रिश्ते ज्यादा अहम हैं। इसलिए भारत का न चाहकर भी चीन के साथ दिखाई देना भी अमेरिका की ही विफलता है जिसके बीज 1972 में पड़े थे।

 

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